द कश्मीर फाइलस, 90 के दशक की एक ऐसी घटना जिसे 30 वर्षों तक किसी ने दिखाने बताने की हिम्मत नहीं की और आज जब तमाम अटकलों और रुकावटो के बावजूद सच्ची घटना आधारित फिल्म the kashmir Files सिनेमा घरों मे रिलीज हो चुकी है, तब सोशल मीडिया पर चारो तरफ इसी के चर्चे है।
सोशल मीडिया मे ट्रेंड कर रहे पोस्ट के कुछ अंश यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।
The Kashmeer Files के सबक
फेस बुक समीक्षाओं से भरा पड़ा है, भावनाएं उबाल पर हैं । यदि ये सब टिकट में बदल जाएं तो यह फ़िल्म ब्लॉक बस्टर हो जाएगी । एक तरफ दर्शक हैं जो निःशब्द हैं, दूसरी तरफ वही भांड समीक्षक हैं जिनका एजेंडा, नैरेटिव सेट है । भास्कर में कोमल नाहटा ढाई स्टार दे रहे हैं । विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी ( वही चोपड़ा हैं जिनने शिकारा नामक घटिया सच से दूर फ़िल्म कश्मीरी पंडितों पर बनाई थी) अनुपमा चोपड़ा लिखती हैं इससे कश्मीर के एक धर्म विशेष के निवासियों की भावनाएं आहत होंगी। इण्डियन एक्सप्रेस ने मात्र 1.5 रेटिंग दी है 5 में से ।paytm की रेटिंग 9.9/ 10 है ।
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फ़िल्म में जब हीरो पल्लवी जोशी से जीनोसाइड की बात करता है तो वो कहती है सब मन गढ़ंत है । कहाँ लिखा है? किस अखबार में खबर है? सारे अखबार सिर्फ 210 गैर मुस्लिम कश्मीरियों की मौत की पुष्टि करते हैं । मतलब जो लिखा नहीं गया,रिपोर्ट नहीं किया गया, जिसे छुपा लिया गया वो घटित ही नहीं हुआ ।
दिवंगत जय प्रकाश चौकसे कहते थे सिनेमा महसूस करने की चीज़ है । जिस दिन आप सिनेमा को अपने आप से कनेक्ट करते हैं वो दिल को छू जाता है, सब अपना सा लगने लगता है, भरम होता है हम भी इसके किरदार हैं । भारत में सिनेमा में सब कुछ अधकचरा भी परोस दिया जाता है । जैसे शिकारा,मिशन काश्मीर या हैदर ।

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फ़िल्म में बातें तथ्यपरक करने की ज़िम्मेदारी कहानीकार, निर्देशक और अभिनेताओं की होती है । हॉलीवुड हमेशा यह जिम्मेदारी बिना सेंसर के निभाता रहा है । क्योंकि इतिहास नहीं पढ़े जाते पर सिनेमा अमर है । द्वितीय विश्व युध्द पर बनी फिल्में सेविंग प्रायवेट रेयान, इन द लाईन ऑफ फायर हो या द बॉय इन स्ट्रिप्ड पाजामा, या शिण्डलर्स लिस्ट या jfk , सबकी सब दुस्साहसी फ़िल्म हैं सच के करीब हैं और गलतबयानी नहीं करतीं ।
उसी की जगह लगभग दो साल पहले आई फ़िल्म भारत बताती है कि 1947 के दंगे भारत से शुरू हुए थे और हिंदुओं ने शुरू किए थे ।
दो पीढ़ी गुजरने दो सिनेमा देखने वाले यही सत्य मान लेंगे । हैदर कश्मीर में सेना के अत्याचार को दिखाती है( मैंने इन दोनों ही फ़िल्मों को ना देखना ही चुना था) । जो काश्मीर गया है ना, उसने, सेना को उसके समर्पण को देखा है और उसके जवान किस खतरे के बीच काश्मीर को बचा रहे हैं यह जाना है । एक गलती और जीवन समाप्त ।
कश्मीर फाइल्स में बुरहान वानी का जिक्र है । आतंक का ग्लैमराइज़्ड चेहरा था । उनका अपना स्व घोषित आतंकी । उसकी मौत ने कश्मीर को हिला दिया था । एक हंगामा बरपा गया था । अगस्त 21 में जब काश्मीर गया तो पेपर में मुख्य पृष्ठ की खबर थी बुरहान के पिता जो एक सरकारी शिक्षक थे ने अपने स्कूल में तिरंगा फहराया । हमारा ड्रायवर जो पहलगाम, गुलमर्ग ले गया नाराज़ था कई कई मौतें औऱ400 से 450 पैलेट गन से घायल हुए पत्थरबाज थे बुरहान वानी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में शामिल हुए थे उसका गम मनाया था और उसके बाप ने तिरँगा लहराया ? नौकरी क्यों नहीं छोड़ी?
ये आम काश्मीरी है धारा 370 हटने के बाद, चप्पे चप्पे पर फौज की निगरानी के बाद । आप सोचिए 19 जनवरी 1990 को क्या हुआ होगा जब सब उनका था । प्रधानमंत्री को नागरिकों से ज्यादा मुख्यमंत्री से दोस्ती प्यारी थी ।
सिनेमा में विवेक अग्निहोत्री ने एक परिवार, एक आतंकी की कथा कही है । पहली बार कश्मीर अमरनाथ यात्रा पर 2007 में गया था फिर 2015 और फिर अभी 2021 अगस्त में ।
फ़िल्म में पड़ोसी बताता है कि आदमी अन्न के ड्रम में छुपा है, सच बयान करने वाले बताते हैं कि आतंकी ढूंढ कर लौट रहे थे पड़ोस की महिला ने बताया था कि उसे ऊपर देखा था, तुम लोगों ने अन्न भंडार में देखा?
या आरा मशीन पर चीरने का दृश्य है वो सच अनन्त नाग का है जहां लकड़ी का काम होता है । एक स्कूल टीचर जिन लोगों के साथ काम करती थी अपनी तनख्वाह लेने गयी थी अनगिनत लोगों ने रेप करके उसके शरीर को आरे से दो भाग किया था और सड़क पर फेंक दिया था । सेना ने उसका अंतिम संस्कार किया था ।
आप जब काश्मीर जाते हो और खासकर लेह के बाद जाते हो तो आपको सदमा लगता है । लेह की हॉस्पिटलिटी काश्मीर में झूठ फरेब में बदल जाती है । आप महसूस करते हो आम कश्मीरी झूठ ही बोलता है, पहनता,ओढ़ता है । लेह कारगिल का व्यक्ति कश्मीर के अपने ही धर्म वाले पर भरोसा करने के बजाय टूरिस्ट पर ज्यादा भरोसा करता है । तो ये कहानियां सच ही लगती हैं ।
1990 में ,हमारे वक्त में तब जबकि हम जवान हो रहे थे, बेरोज़गार थे हर खबर पर नज़र रहती थी इतना बड़ा पलायन हो गया नरसंहार हो गया और पता ही नहीं चला । अखबार बिक गए उनके मालिक नीलाम हो गए एक पत्रकार ना हुआ जो सच बताता । पैसा जीवन के लिए महत्वपूर्ण है पर जीवन ही पैसे के लिए हो जाये तो?
अभी 10 मार्च को चुनाव परिणाम आ रहे थे । अरविंद केजरीवाल ने सभा लेनी शुरू की तो हर जगह सिर्फ वही था बाकी कुछ नहीं । पैसा कितना शक्तिशाली है । पूरा देश वर्षों इस खबर से महरूम रहा । 5 लाख गैर मुस्लिम कश्मीरी अपनी आहों में असर पैदा ना कर सके । सारे तथ्य सारे सबूत थे यासीन मलिक ने 4 वायु सेना अधिकारियों की हत्या की, उसके बाद भी उसकी पहुंच दिल्ली दूर दर्शन और प्रधानमंत्री कार्यालय तक रही । आतंक के खिलाफ भारत को भी नैरेटिव सेट करना चाहिए ।
मानवाधिकार के मंच पर मुद्दे उठाना चाहिए । और बिके हुए मीडिया पर लगाम लगानी चाहिए ।
धारा 370 हट गई है, तिरंगा भी फहरा रहा है पर लोग आज भी बगल में छुरियां दबाए हुए हैं । जरा सी चूक नुकसान गहरा करेगी । कश्मीर तभी तक इस पाले में है जब तक सेना है । आगे राह कठिन है पुष्करनाथ तो फ़िल्म में अस्थियों के रूप में अपने घर पहुंचे पर अभी बाकी पंडितों को लंबा रास्ता तय करना है ।
हालात कश्मीर के जस के तस हैं जो पंडित लौट रहे हैं उन पर जुल्म सितम जारी हैं साथ ही उदार मुस्लिम भी कत्ल किये जा रहे हैं । कल ही खबर थी किसी सरपंच की हत्या कर दी। नफरत किसी को कहीं लेकर नहीं जाती । वामपंथियों ने इतिहासकारों ने बुध्दिजीवियों ने एक फार्मूला पकड़ा है झूठ को इतना बोलो कि वह सच हो जाये ।
वो जैसे झूठ बोलते हैं हम सच बोलना क्यों नहीं शुरू करते । फ़िल्म उसकी बेबाक बयानी पर चर्चा कीजिये, हौसला अफजाई कीजिये। उसे सफल बनाइये तभी वह इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी ।औऱ हाँ
जय हिंद
साभार स्वाभिमान शुक्ल
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